जिंदगी की दौड़ में
मुसाफिर रोज निकलते हैं।
ख़्वाबों की तलाश में
कितने मंजिलें बदलते हैं।
ज़रूरतें पूरी कर ली जिसने
ख्वाबों को अपने बेच कर,
ख्वाहिशें सारे सहेज कर।
कुछ काम था अपनी मर्जी की
कुछ काम था मजबूरी की ।
फिर वक़्त बहुत ही कम था
और सारे काम ज़रूरी था।
ना हारे हैं, ना जीते हैं, बस चल रहे हैं।
कहाँ ? पता नहीं !
किस ओर ? पता नहीं !
रुक कर भी देखा, ठहर कर भी देखा,
पर राज़ - ऐ - जिंदगी हाथ नहीं आया।
फिर सोचा, अगले मोड़ पर सुकून होगा,
चल जिंदगी थोड़ा और चलें।
ऐ जिंदगी कभी तो इश्क़ करले,
शिकायते है जो, थोड़ा तो बयान कर दे,
हारी हुई शामों में, साथ एक पल का तो दे दे।
कभी तो गले से लगाले,
उलझने मन की कभी तो सुनले।
इतनी बदसलूकी ना कर
" ऐ जिंदगी "
हम कौन सा यहाँ बार बार आने वाले हैं।
मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
कल भी मुसाफिर थे,आज भी मुसाफिर हैं,
कल अपनों की तलाश में थे,
आज अपनी तलाश में।
हम हर चीज़ कुछ ज़्यादा करते हैं
प्रेम भी, इश्क भी, ग़म भी, मलाल भी,
जनाब ! हम शायर हैं ।
जिंदगी - ऐ - मुसाफिर से ,
गुफ़्तगू कुछ ज़्यादा करते हैं।।
कब तक अनजान रहेगी तू,
कभी तो अपना पता बता दें,
ऐ जिंदगी कभी तो इश्क़ कर ले ।।
कुछ रास्तें जिंदगी बना देते हैं,
और कुछ मुसाफिर, यादें।
हर मोड़ पर एक नई कहानी,
नई तलाश, नई मंज़िल।
राहें कभी खत्म नहीं होती, बस
मुसाफिर बदल जाते हैं,
जिंदगी के सफर में।।

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